साधो! कुलपति की बलिहारी
खड़े खड़े माइक पर करता, केवल दांत चियारी
सत्ता ही जिसकी खातिर है, बनी बाप महतारी
क्या जाने साहित्य कला संस्कृति की महिमा न्यारी
हैं मनोज रूपड़ा न समझो, तुम भाजी तरकारी
लिखें समय को क्या जाने ये अपसंस्कृति हत्यारी
विद्या के मंदिर में बैठा कैसा अत्याचारी
लेखक का अपमान कर रहा जैसे है मति मारी
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