यश मालवीय

यश मालवीय की कविता


झालमुड़ी भइ झालमुड़ी
 
झालमुड़ी भइ झालमुड़ी 
झालमुड़ी भइ झालमुड़ी 
अचरज है दस रुपए में,
नोट भी दे दी तुड़ी मुड़ी 
महंगी सदरी है तन पर
शक्ल है लेकिन उड़ी उड़ी
फैल के बैठे नेता जी
जनता बैठी गुड़ी मुड़ी 
जीतेंगे रंगा बिल्ला 
ये कैसी अफवाह उड़ी 
जय बांग्ला को पता है ये 
टूट के फिर न डोर जुड़ी 
केवल नाच नचाएगी 
सत्ता की शैतान कुड़ी&....

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