आदिवासी चरवाहे
चरवाहे निरंतर यात्र करते रहे
बर्फीले पहाड़ से उतरकर
घास के मैदान पर चलते रहे
धरती को कभी घाव नहीं दिया
खुद नंगे पैर चलते रहे लहूलुहान
उनकी यात्र थी जीवन के लिए
चरवाहों के सहयात्री होते हैं
बादल, हवा, नदी, परिंदे
चरवाहे प्रेम के गीत गाते रहे
कभी पहाड़ की भाषा में
तो कभी जंगल की भाषा म....
