सारिका भूषण

सारिका भूषण की कविताएं

 मैं और सूरज   

मुझे
मेरे हिस्से की धूप मिली
मुझे
उसके हिस्से की भी धूप मिली
उसने
रिश्तों में कुछ कीलें ठोंकी
घर की दीवारें दरकने लगीं
उसने
छप्पर से एक खपड़ा हटाया
घर बिना छत-सा दिखने लगा
मैंने उस छत के नीचे
पलते-बढ़ते रिश्तों को देखा
फिर मैं छत बन गई
अब बारी-बारी से
सभी के हिस्से की धूप
मुझे मिलती गई
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