सुपरिचित कथाकार हरियश राय का पांचवां उपन्यास ‘दूब’ यानी हरी-भरी जमीन की सतह पर उगी कोमल दूब। कहना न होगा कि दूब में एक प्रकार की पवित्रता है, जो घास में नहीं है। हरियश इस दूब को बचाना चाहते हैंµचाहे वह धर्मपुर सोलन में उगी हो या दुनिया के किसी भी कोने में। यह उपन्यास मनुष्य से प्रकृति की ओर महायात्र है अथवा इसे दोनों की सह-यात्र भी कह सकते हैं जिसमें हर पग पर....
