कविता हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बन पा रही है? जिस तरह कहानी और उपन्यास, या नाटक और रंगमंच? समकालीन कविता को लेकर यह सवाल यों उठ रहे है? कथाकार कहेंगे कि वे जो कुछ लिख रहे हैं, समाज उसकी साख है। अतिरेक समझते हुए भी किसी ए विधा को लेकर नहीं समस्त विधाओं को लेर सामाजिक स्वीकारता का सवाल उठता है। कविता के आलोचक जो स्वयं एक कवि है, ए- अरविंदाक्षन अपने छोटे-स....
