प्रतीयमानं पुनरन्यरेव वस्त्वस्ति वाणिषु महाकविनामम्।
यत्तत्त्प्रसिवयवातिरिक्तं विभाति लावण्य मिवाघ्नासु।।4।।
(महाकवियों के वचनों में अर्थवान कुछ और ही वस्तु है, जैसे स्त्रियों में उनके प्रसिद्ध अंगों के अतिरिक्त लावण्य भासित होता है।-ध्वन्यालोक)
नौंवी शताब्दी में आनंदवर्धन रचित ध्वन्यालोक में इसी लावण्य को काव्यार्थ बताया गया है। स्त्....
